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Monday, February 28, 2011

समीक्षा: कुछ अजीब-सी फिल्म है ‘तनु वेड्स मनु’


इस हफ्ते सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई है निर्देशक आनंद राय की फिल्‍म ‘तनु वेड्स मनु’। यूं तो किसी भी फिल्‍म की शुरूआत में उसकी आगे की कहानी का अंदाजा लगाना मजेदार होता है, लेकिन ‘तनु वेड्स मनु’ कुछ अजीब ही हो जाती है।

अभिनेता आर. माधवन फिल्‍म में लंदन में बसे दिल्‍ली के एक लड़के मनु शर्मा के किरदार में हैं, जिसे पहली बार में उस लड़की से बेहद प्‍यार हो जाता है, जिसे उसके माता-पिता ने उसके लिए चुना है।

वैसे इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन जो अजीब है वह यह है कि जो लड़की तनु त्रिपाठी यानी कंगना रानौत उनकी इस पहली मुलाकात के दौरान बेहोश है।

इस उलझन भरी प्रेम कहानी में यह फिल्‍म एक वीडियो डायरी की तरह कानपुर से लखनऊ, लखनऊ से मेरठ, नई दिल्‍ली और आखिरी में पंजाब तक पूरे उत्तर भारत के चक्कर काटती नजर आती है।

हां, इस वजह से यह फिल्‍म काफी चार्मिंग लगती है पर जल्‍दी ही यह चार्म खत्‍म हो जाता है जब फिल्‍म पर ‘जब वी मेट’ का असर नजर आता है।

किसी भी वक्त कुछ भी बोल देने वाली तनु, ‘जब वी मेट’ की गीत की दूर की कोई रिश्‍तेदार लगती है पर दोनों में एक फर्क है। जहां गीत में बचपना था, वहीं तनु पूरी तरह से अपने लिए जीने वाली लड़की है।

जहां फिल्‍म में वह एक तरफ मनु से सगाई तोड़ने की बात करती है, ताकि वह अपने पुरुष मित्र के साथ भाग सके, वहीं एक दोस्‍त की शादी में वह मनु के पीछे पड़ जाती है।

अब बात मनु की। चुपचाप से रहनेवाले इस रोमांटिक हीरो पर तरस खाने की कोई जरूरत नहीं है यह बहुत बड़ा बोर है।

मनु जानता है कि तनु किसी और से प्‍यार करती है फिर भी वह उसके माता-पिता को उसके पसंद के लड़के से शादी करने के लिए राजी करता है, इतना ही नहीं, वह उसके साथ शादी का जोड़ा भी खरीदने जाता है।

जाहिर तौर पर उसका यह प्‍यार रंग लाता है और अंत में वे मिलते भी हैं, पर उससे पहले पटकथा में इतने मोड़ और इतनी उलझनें आती हैं कि फिर आश्चर्य में पड़ने के लिए कुछ भी बच नहीं जाता है।

फिल्‍म में कंगना एक नए रूप में नजर आती हैं। कहीं-कहीं पर टूटे-फूटे संवादों के कारण कंगना अपने किरदार को पूरी तरह से पर्दे पर उतारने में सफल नहीं रहतीं, लेकिन सिवाय इसके फिल्‍म में वे हर चुनौ‍ती को अच्‍छे से निभाती हैं।

वहीं, आर. माधवन अपने किरदार में शुरूआत में तो अच्‍छे लगते हैं पर बाद में वे सिर्फ एक सहायक भूमिका की तरह लगते हैं।

अब अगर फिल्‍म में किसी का अभिनय काबिले-तारिफ है तो वह दीपक डोबरियाल का है जो मनु के अच्‍छे दोस्‍त और उसके हमराज के तौर पर काफी मजेदार लगते हैं। फिल्‍म में उनकी प्रतिक्रियाएं से कुछ बेहतरीन दृश्‍य बन पड़े हैं।

‘तनु वेड्स मनु’ उतनी बुरी भी नहीं है। फिल्‍म के पहले हिस्‍से में कुछ ऐसे दृश्‍य हैं, जो मनोरंजनात्‍मक हैं; पर एक टूटी-फूटी पटकथा के साथ वह अपनी छाप नहीं छोड़ पाती है।

मैं निर्देशक आनंद राय की ‘तनु वेड्स मनु’ को पांच में से दो अंक देता हूं। इसमें कुछ अच्‍छे दृश्‍य जरूर हैं, पर वे बहुत थोड़े हैं और बहुत देर के बाद आते हैं।
 

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